Panaah

कुछ रातें बस यही सोच में गुज़रती हैं

के आपके दिल में ना सही

काग़ज़ पे ही उतर जाते,

ख़ामख़ा आपके कलम से

कुछ ऐसे अल्फ़ाज़ बन जाते।

आपका पास ना होना ही सही

कुछ शब्दों से ऐसा एहसास ही दे जाते।

रहने को घर तो ज़रूर है

पर आपकी सियाही से जुड़ कर,

इन आँखों को एक नज़ारा

और दिल को रहने के लिए

पनाह ही दे जाते।