Naaraazgi

अक्सर किताबों में मिला करती है
उनकी रूह की महक कोई नज़्म सी मालूम होती है
हज़ारों दफ़ा पढ़ी है
समझी है, समझायी है
कुछ लफ़्ज़ अधूरे रह जाते हैं
कुछ बातें फिर छिड़ जाती हैं
वो फिर एक बार उनका ख़फ़ा होना
और बहाने से मुझसे जुदा होना
नाराज़गी के क़िस्से भी यूँ साँस ले रहे हैं
मानो वस्ल की सुबह अब नसीब ही ना हो

Ummeed

हर कोशिश नाकाम लगती है
इंसान इस कदर हार चुका है
हर आरज़ू भी नाराज़ लगती है
अब जो इंसान थक चुका है
हर पल बेचैन और हर धड़कन तेज़
अंधेरा गहरा भी हो तो ख़ौफ़ नहीं
जब दिन के उजाले में उम्मीदें ही
सहमे पैरों से चलती है

Maujood

फ़ासले इस कदर भी नहीं थे
के मोहब्बत साँस ना ले पाए
अब भी थोड़ी जान थी दिल्लगी में
जो मेरे वजूद में भी तुझको ही मौजूद पाए

दिन ढले, पलकों के तले
आहें भरते हुए तुम्हें पाया है
खुश्क मौसम में भी आँखों ने
सैलाब के रूप में तुझे सजाया है

नाकाम रही हो हर कोशिश
सर-आँखों पे तो बिठाया है
तुझे ख़्वाहिशों से नहीं बांधा
पर इस रिश्ते को मैंने अकेले ही निभाया है

तन्हाई का दौर तो कुछ और था
तुम्हारी चाहत को महफ़िल की तरह मनाया है
बेदर्दी ही क्यूँ ना ठहरे तुम जनाब
इस रुस्वाई से भी हमने दिल बहलाया है

फ़ासले इस कदर भी नहीं थे
के मोहब्बत साँस ना ले पाए
अब भी थोड़ी जान थी दिल्लगी में
जो मेरे वजूद में भी तुझको ही मौजूद पाए


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Be-naam Jazbaat

एक हलचल महसूस होती है तनहा ख़यालों में
बेचैन खामोशी का शोर सुनाई देता है उन्ही राहों में

तसल्ली की गुंजाइश भी कहाँ है इस दिल से
जो हर रात तारों के तले महरूम रहता है तुम्हारे साये से

कुछ यूँ सुला दी तुमने बातें अनकही और बातें अनसुनी
के वो इंतिकाल से भी लौट आए ये गवारा अब नहीं

सैलाब जैसे बह चुका था, सुर्ख़ आँखें नम कर चुका था
हर साँस का बोझ उठाना होगा, ये भी किसने सोचा था

ख़ुमार उनका ऐसा के ख़ुदगर्ज़ी नक़ाब ना पहचान सके
ख़ुदा से पहले इबादत जो कि उनकी
सज़ा-ए-इश्क़ में हम मारे गए


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Ittifaaq

यूँही तमाम किए जा रहे थे ज़िंदगी
दो पल जो इत्मिनान से बिताते
तो शायद इतनी ना होती तिश्नगी

कुछ बातें तुम कर लेते और कुछ हम भी
मुकम्मल हो जाता ये रिश्ता
जो तुम्हारी समझ में था मुनासिब नहीं

ज़ालिम वो शायद कमबख़्त रात ही थी
दिन के शोर और उजाले में
ऐसे ज़ख़्म कोई देता है क्या कभी

माना तुम्हारी नज़र में ये इश्क़ गवारा नहीं
इत्तीफ़ाकन हमें ऐसी मोहब्बत सिखा गए
इस दीवानगी का भी कोई जवाब नहीं


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Hifaazat

कुछ साँसें आज भी सम्भाल रखी हैं
जो तुम्हारे क़रीब आते ही
यूँ तेज़ी से खर्च होने लगती थी

कुछ धड़कनों को आज भी समझा रखा है
जो तुम्हारी तस्वीर को निहारे ही
यूँ बेवजह शोर करने लगती थी

मगर इस दिल की हिफ़ाज़त कोई कैसे करे
जहाँ तुम्हारे नाम का एक आशियाना बस्ता था
झरोके के बाहर एक नन्हा सा पौधा खिलता था
और कुछ ही दूर नदी का झरना आहिस्ते बहता था

इस बार जब लौट आओ
तो सिर्फ़ लौट जाने के लिए आओ
आशियाने की नींव कमज़ोर हो रही है
पौधे आख़री साँस ले रहे है
और झरना तेज़ी से सूख रहा है

लेकिन इस बार जब लौट आओ
तो सिर्फ़ लौट जाने के लिए आओ
इस दिल को बे-सबब सहारा देके
ऐसे भी तो मत लुत्फ़ उठाओ


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Mehfooz

जिस रोज़ से तुम्हें इन निगाहों ने देखा है
किताब के पन्नो में तबसे समेटा है

कश्मकश में रहती है फिर भी सियाही
जो उनको क़ैद करने से है थोड़ी हिचकिचाती

एक दिल ही में उनकी जगह है महफ़ूज़
जहाँ दिन रात है आज़ादी की महक आती


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Kashmakash

दिल-ए-नादान इस कश्मकश की वजह क्या है
आज जो उनसे रूबरू हुए तो
खुद से ख़फ़ा होने की वजह क्या है

जिंसे मिलानी थी निगाहें कुछ अर्से से
आज यूँ उनसे रुख़्सत होके
नज़रें चुराने की वजह क्या है

ख़ुमार-ए-ग़म में बीति थी जो हिज्र की रात
आज नज़दीक हो के भी
जुदाई का एहसास देने की वजह क्या है

कुछ लफ़्ज़ सम्भाल रखे थे जो बयाँ करते दास्ताँ-ए-दिल
आज होठों से ज़िक्र भी गवारा ना होने की वजह क्या है

महक्ती थी रूह जिनके आशियाने से जुड़ कर
आज गुलों के अन्दाज़ जो है बदले तो
गुल्शन में बहार ना आने की वजह क्या है

दिल-ए-नादान इस कश्मकश की वजह क्या है
आज जो उनसे रूबरू हुए तो
खुद से ख़फ़ा होने की वजह क्या है


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Ghazal

अगर सोज़-ए-ग़म से हम रूबरू ना होते
मुलाक़ातें ऐसी के दिल कमज़ोर ना होते
और दीवानगी के किस्से गली कूचे में ना होते
उनकी रूह से आश्ना कई बरस पहले जो हुए थे
हम अपने कहाँ रहे उस पहर से
जो दिल-ए-ग़ज़ल से मुकम्मल हुए थे


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Tasveer

कुछ अजनबी आहट दस्तक देती है
दिन इज़्तिरार में गुज़र जाता है
रात ही है जो लम्बी लगती है
कभी ग़ज़ल ने सीने से लगाया
तो कभी शायरी का सहारा था
एक तुम्हारी तस्वीर को देखा
और हर नज़्म में तुम को पाया


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